भारत विविधता में एकता का राष्ट्र हे. भारत अपनी संस्कृति के लिए पुरे विश्व भर में काफ़ी प्रसिद्ध हे. साथ ही भारत अपने प्राचीन शास्त्रीय नृत्य के लिए भी अति प्रसिद्द हे. भारत के शास्त्रीय नृत्य अति प्राचीन नृत्यों में से एक हे. साथ ही यह एक उदाहरण भी हे की भारत में नृत्य की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आयी हे. आज हम कई अनेक प्रकार के नृत्य देखते हे. किन्तु आज के वह नए नृत्य के कदम (Step ) भी पुराने भरतनाट्यम जैसे नृत्य में से ही लिए गए होते हे. एसे भी कहा जाता हे की नृत्य सिखने के लिए पहले भरतनाट्यम ही सिखाया जाता हे क्यूंकि इस नृत्यकला में नृत्य के सभी कदम (Step ) आ जाते हे.

आइये तो भारत के शास्त्रीय नृत्य के बारे में जानकारियां जानते हे :- 

भरतनाट्यम ( Bharatnatyam ) :- 

भरतनाट्यम नृत्य भारत के अति प्राचीन नृत्यों में से एक हे और तक़रीबन 2000 सालों से व्यवहार में हे. इस नृत्य का उल्लेख भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में भी मिलता हे. भरतनाट्यम नृत्य का संबध तमिलनाडु राज्य से हे. शुरूआती काल में भरतनाट्यम नृत्य देवदासियों द्वारा तमिलनाडु के मंदिरों में किया जाता था. देवदासियां उन युवतियों को कहाँ जाता था जो अपने माँ-बाप द्वारा मंदिर को दान में दे दी जाती थी और उनका विवाह मंदिर के देवता से किया जाता था. और मंदिर के देवता ओ को अर्पण के रूप में इन देवदासियों द्वारा मंदिर में नृत्य किया जाता था. भरतनाट्यम नृत्य में मुख्य भाव , राग और ताल का संगम होता हे. इस नृत्य में मुख्य चहेरे के हाव -भाव , हाथ , पैर तथा शरीर की गतिविधियाँ और हस्त मुद्राए द्वारा नृत्य अभिव्यक्त किया जाता हे. इस नृत्य में एक गायक तथा एक नट्टूवनार होता हे. नट्टूवनार वह होता हे जो नृत्य का पठन करता हे. साथ ही विणा, बांसुरी, मृंदगम और करताल वादक भी होते हे.

कथक ( Kathak ) :-

कथक का शाब्दिक अर्थ कथा होता हे. प्राचीन काल में कथा यानि कहानी सुनाने वाले लोगो को कथक कहा जाता था. शुरुआती में यह नृत्य ब्राह्मणों द्वारा मंदिरों में किया जाता था किन्तु मुस्लिम और पर्शियो के प्रभाव से धीरे धीरे यह नृत्य मंदिरों से दरबारी यों के मनोरंजन तक पहोच गया. इस नृत्य की मुख्य विशेषता पैरो की गतिविधियाँ होती हे. कृष्ण भगवान की बचपन की कहानी , दंतकथा तथा अन्य पौराणिक कथा पर नृत्य किया जाता हे.

कथकली ( kathakali ) :- 

कथकली नृत्य शैली भारत के केरल राज्य में विकसित हुई हे. इस नृत्य कला में चहेरे के हाव भाव तथा मुद्रा ओ को विशेष महत्व दिया जाता हे . इस नृत्य कला में आँखों तथा भौहो की गतिविधिओ को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त किया जाता हे. इस नृत्य में मुकुट के साथ साथ चहेरे के शृंगार के लिए विविध रंगों का भी प्रयोग किया जाता हे . रामायण तथा महाभारत की कथा पर नाट्य नृत्य किया जाता हे .

कुचीपुड़ी ( Kuchipudi ) :- 

कुचीपुड़ी भारत के आँध्रप्रदेश राज्य के कृष्णा जिल्ले का एक ग़ाव का नाम हे. इसी ग़ाव में कुचीपुड़ी नृत्य का जन्म हुआ हे. शुरूआती में यह नृत्य केवल पुरुष ब्राह्मणों द्वारा ही भगवान को समर्पित किया जाता था. और पुरुष ब्राह्मण ही महिला का रूप लेकर नृत्य करते थे. बाद समय बदलते महिला भी कुचीपुड़ी नृत्य में हिस्सा लेने लगी. इस नृत्य में शारीरिक संतुलन, पानी से भरा हुआ घड़ा लेकर तथा पित्तल की थाली की किनारी पर नृत्य करना जैसे अनेक कुशलताए भी की जाती हे. प्रमुख वाध्य वायलिन तथा मृदंगम हे. साथ ही इस नृत्य में विणा तथा मंजीरा वादक का भी समावेश किया जाता हे.

मणिपुरी ( Manipuri ) :- 

मणिपुरी नृत्य का विकास भारत के मणिपुर राज्य में हुआ. यह नृत्यकला अन्य शास्त्रीय नृत्य कला से भिन्न हे. मणिपुरी नृत्य कला का पोशाक भी अन्य नृत्यकला ओ से भिन्न हे. इस नृत्य में चहेरे के हाव -भाव को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता. तथा शरीर धीमी गति से नृत्य करता हे. साथ ही इस नृत्य में तांडव तथा लास्य दोनों का समावेश किया जाता हे. शिव -शक्ति और रास – लीला जैसे अनेक विषय पर यह नृत्य किया जाता हे.

ओड़ीसी ( Odissi ) :- 

यह नृत्य भारत के प्राचीन तथा पारंपरिक नृत्य में से एक हे. ओड़ीसी नृत्य भारत के ओड़ीसी राज्य से विकसित हुआ हे. कोर्णाक के सूर्यमंदिर तथा भुवनेश्वर की प्राचीन गुफ़ा में भी इस नृत्य का वर्णन किया गया हे. इस नृत्य की मुख्य मुद्रा त्रिभंग हे जिसमे सिर,शरीर और पैर ऐसे तिन हिस्सों में बाटकर नृत्य अभिव्यक्त किया जाता हे. इस नृत्य में भगवान विष्णु के अवतार जगन्नाथ तथा शिव और सूर्य की कथाए बताकर यह शास्त्रीय नृत्य – नाटक भी किया जाता हे.